Wednesday, 11 March 2015

सरहद की दीवार

अभी कुछ दिन पहले वाघा-अटारी बार्डर पर थे । देशभक्ति उफान पर थी इधर से हम हिंदुस्तान जिंदाबाद चिल्ला रहे थे उधर से वो पाकिस्तान जिंदाबाद चीख रहे थे । तभी न जाने क्यों एक अंग्रेज पर नज़र गई जो एक बार हमें चिल्लाते हुए देखता है अौर फिर उन्हें चीखते हुए देखता है अौर फिर पास ही खड़ी अपनी गर्लफेंड के कान मे कुछ कहता है अौर दोनो खिलखिलाकर हँसने लगते है । मुझे शर्म महसूस होती है अौर निगाहें झुक जाती है ।
              यहाँ आकर लगता है कि ये दोनो देश कितने पास होकर भी कितने दूर हैं । 
                                                                                                           -सलमान अली 

Thursday, 19 February 2015

भाषा सांप्रदायिक हो सकती है ?

क्या वाक़ई कोई भाषा सांप्रदायिक हो सकती है ? आसान शब्दों में भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारो को व्यक्त करते हैं ! अब ये लिखने वाले पर निर्भर करता है कि उसके विचार लोकतांत्रिक है या सांप्रदायिक ! अगर आपके विचार सांप्रदायिक हैं तो आप उसे दुनिया कि किसी भी भाषा में चस्पा करें वो हर हालत में सांप्रदायिक ही रहेंगे ! सांप्रदयिकता तो वहाँ भी है जहां हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार नहीं है ! वहाँ भी तो दंगे होते होंगे और भड़काऊ भाषण भी दिए ही जाते होंगे बस उनको लिखने का माध्यम अलग होगा !  फिर क्या वजह हो सकती है कि आप किसी भाषा को सांप्रदायिक कह देते हैं ?
              इस बेमतलब और घिसे पिटे सवाल से इसिलए जूझ रहा हूं क्योंकि मेरे किसी काबिल साथी ने कहा कि हिंदी एक सांप्रदायिक भाषा है क्यूंकि इसका इस्तेमाल अधिकतर वो वर्ग करता रहा है जो सांप्रादायिक सोच से प्रेरित हैं ! वो ये सब बोलते हुए कहते हैं कि ये उनकी अपनी राय है जो उन्होंने हिंदी के इतिहास व इस्तेमाल को देखकर बनाई है ! ताज्जुब तब हुआ जब सुना कि उनके लिए भाषा कि पहचान कागज़ के वो बिकाऊ टुकड़े हैं जिन्हे हम अखबार कहते हैं !
                              
     एक भाषा का उदाहरण ले लीजिये जिसका इस्तेमाल दहशतगर्द आतंकवाद के प्रचार प्रसार के लिए करते हैं तो क्या आप उस भाषा को भी आतंकवादी भाषा कहने लगेंगे ! आप कहेंगे कि ये क्या बात होती है आतंकवाद का तो कोई धर्म और कोई भाषा नहीं होती ! फिर मै कहूँगा कि जब एक भाषा उसके इस्तेमाल करने वालो के आधार पर आतंकवादी भाषा नहीं हो सकती तो फिर कोई भाषा सांप्रदायिक कैसे हो सकती है ! 
         जनाब इन राष्ट्रवादियों कि बहसों से हम पहले ही बहुत पक चुके हैं ! अब भाषा को भी मत बांटिये की ये भाषा देशभक्त हैं और ये देशद्रोही हैं ! बाकी रही हिंदी भाषा तो जनाब यही वो भाषा हैं जिसने आज़ादी के समय पूरे देश को एक सूत्र में बांधे रखा था ! यही वो भाषा हैं जिसका इस्तेमाल कर रामधारी सिंह "दिनकर" जैसे लेखको ने ऐसी कवितायेँ और लेख लिखे जिसने इस देश के युवा में आज़ादी के प्रति जागरूकता पैदा की और आज़ादी के दीवानो को जोश से भर दिया ! 1 अरब 80 करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को चंद अखबारों और लेखों के आधार पर सांप्रदायिक बोल देना नाइंसाफी हैं !
                                     मेरे नज़रिये में दुनिया की हर भाषा फूल की तरह कोमल हैं अब आप पर निर्भर हैं आप चाहे तो उसके शब्दों को गूंथकर माला बना लीजिये या उसे अपने ही हाथो से रौंद डालिये !
                  - सिराज अहमद

Friday, 13 February 2015

दिल्ली के नायक ?

2015 के दिल्ली चुनाव में जो हुआ वो ऐतिहासिक है की नहीं इसको लेकर लम्बी लम्बी बहसें तो होती ही रहेंगी लेकिन इस चुनाव ने सन्देश दिया है की वोटर को आकर्षक विज्ञापन,धार्मिक समर्थन और जोशीले भाषण से ज्यादा उसके स्थानीय मुद्दे,पार्टी की विश्वसनीयता और नेता की सादगी आकर्षित करती है ! लहर का रुख पलटा या पलट रहा है ये तो पता नहीं लेकिन कल तक जिसे हम भक्त कहने लगे थे उसने इस चुनाव में एक वोटर की तरह सोचकर वोट किया !भाजपा की नकारात्मक बयानबाजी ने AK-49 को AK-67 बनाने में अहम योगदान प्रदान किया ! ये जीत सिर्फ अरविन्द केजरीवाल की जीत नहीं बल्कि गोडसे पर गांधी के आदर्शो की जीत है ! अरविन्द केजरीवाल पर स्याही फेंकी गयी,थप्पड़ बरसाए गए और उनके लिए भद्दे शब्दों का इस्तेमाल भी किया गया लेकिन अरविन्द एक पल के लिए भी घबराये नहीं उन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर जनता के दिल में एक ऐसी छवि बना ली जिसे लोगो ने खूब पसंद किया !                                                                                        
                           कांग्रेस की इस हालत का ज़िम्मेदार शायद उसका अपना नेतृत्व रहा जो कभी लवली को सामने रखता था तो कभी अजय माकन को पेश कर देता था ! कुछ इसी तरह की गलती बीजेपी ने भी की ये भी पहले तो गोयल,जगदीश मुखी,हर्षवर्धन और सतीश उपाध्याय को सामने रख रहे थे और फिर पैराशूट से किरण बेदी को मैदान में ले आये ! किरण बेदी का इस तरह पार्टी में आना और फिर मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया जाना न सिर्फ जनता को अखरा बल्कि उनकी अपनी पार्टी व कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया ! इसके बाद किरण बेदी के बरताव , प्रधानमंत्री मोदी के 10 लाख वाले सूट और अमित शाह का 15 लाख वाली बात को चुनावी जुमला बताना इत्यादि ने बीजेपी को इस हालत पर पंहुचा दिया की वो नेता विपक्ष के लायक भी नहीं बची ! आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को दिल्ली से पोछ कर साफ़ कर दिया और बीजेपी को एक कोने में समेट कर रख दिया ! अब कांग्रेस ठन्डे बस्ते में चली गयी है और बीजेपी भी अपना आधार खोती नज़र आ रही है ! अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति के इन दिगज्जो को हराकर राजनीति में लोगो के विश्वास को फिर से जगा दिया है ! अब अरविन्द लोगो के प्रति कितने खरे उतरते है इसके बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी ! हमे भी अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को जज करने से पहले उन्हें भी कुछ वक़्त देना होगा ! देखते हैं अभी तक जिस अरविन्द की तुलना "नायक" फिल्म के अनिल कपूर से की जा रही थी क्या वो भी वैसे ही "नायक" बन कर उभरेंगे या भारतीय राजनीतिक परंपरा का अनुशरण करते हुए चुनाव के बाद जनता और उनके विकास को भूल जाएंगे ! ये सब जानने के लिए इंतज़ार करना होगा तब तक आप 15 लाख और वाईफाई के सिग्नल चेक करते रहिये !
                                                     -सलमान अली

Monday, 29 September 2014

अमेरिका वाले मोदी जी !




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आपने 9/11 के पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त कि इससे मुझे बड़ी तसल्ली हुई ! यकीन हो गया कि आप भी इंसान को इंसान ही समझते है न की "कुत्ते का पिल्ला" ! लेकिन एक सवाल भी सामने आ गया मेरे क़ि आपकी यही संवेदना तब कहाँ चली जाती है जब बाबरी मस्जिद कि शहादत कि बात आती है । आपका ये मोम सा दिल तब पत्थर क्यूँ बन जाता है जब 2002 के गुजरात दंगो की बात आती है । क्या इन दंगो में मरने वालो के प्रति आपके दिल में कोई प्रेम नही , कोई सहानुभूति नही । आप अब भारत के प्रधानमंत्री हो इसीलिए आपसे गुज़ारिश करूंगा कि हो सके तो थोडा सा यही दर्द ,प्यार और संवेदना उनके लिये भी बचा लाना जिन्हें आज तक इन्साफ नही मिला ।
                       उनके लिए जिनके सामने उनकी माँ,बहन,बेटी के साथ बलात्कार किया गया ! इन्साफ उनके लिए जिनकी आँखो के सामने उनके पति,बाप,बेटों को मौत के घाट उतार दिया गया !
--------------------सलमान अली------------------

Wednesday, 17 September 2014

यही बापू का सच्चा रास्ता है।

सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले को समझ लेना चाहिए कि यह रास्ता शहीद होने का रास्ता है। सत्य और अहिंसा के रास्ते पर जो कोई इफेक्टिव( परिणामात्मक), काम करेगा वह एक न एक दिन मारा जाएगा। सत्य और अहिंसा का रास्ता दुनिया नहीं सह सकती। बापू जी की जीवनी को देखिये, उन्हें जब दूसरा कोई मारने के लिए तैयार नहीं होता था तो वे अपनी आत्माहुति देने पर तुल जाते थे। अपने मारे जाने के मौके पैदा कर देते थे। अभी मानवता की इतनी प्रगति नहीं हुई है कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर मज़बूती से चलने वाला भी न मारा जाए। आपको अपनी आहुति देने के मौके पैदा करने होंगे। आपकी किस्मत अच्छी होगी तो नहीं मारे जाएंगे। लेकिन शायद मारे जाने पर आप की दैवीशक्ति सफल होगी। अगर कांग्रेस ने कुर्बानी कारास्ता छोड़ दिया तो उसका काम न चलेगा। कुर्बानी का रास्ता गांधी जी दिखा गए हैं। उस हुतात्मा के रास्ते पर हम को चलना है। अगर हम में दम है तो गांधीजी के नाम पर नहीं बिकेंगे। उनकी जो चीज़ हम को जंचेगी उसे लेंगे, जो नहीं जंचेगी उसे छोड़ देंगे। लेकिन सत्य और अहिंसा की राह हरगिज़ न छोड़ेंगे। यही बापू का सच्चा रास्ता है।

                                                      - आचार्य जे बी कृपलानी (14 मार्च 1948, यह हिस्सा मैंने आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट से प्रकाशित शहादत का रास्ता से लिया है। 011-23234190)

Saturday, 13 September 2014

भारतीय मुसलमान !

The rich legacy of Nizams




DC CORRESPONDENT | June 01, 2014, 00.06 am IST
Mir Osman Ali Khan receives Prime Minister Lal Bahadur Shastri at Begumpet airport. Responding to Shastri’s appeal, the Nizam donated 5000 kg of gold to the National Defence Fund
Mir Osman Ali Khan receives Prime Minister Lal Bahadur Shastri at Begumpet airport. Responding to Shastri’s appeal, the Nizam donated 5000 kg of gold to the National Defence Fund

Thursday, 11 September 2014

बाबरी मस्जिद

फिर तेरी कहानी याद आती है ! तुम्हारी खूबसूरती के किस्से आज भी , अखबार के किसी पुराने टुकड़े में मिल जाएंगे ! मुगलो के कला व स्थापत्य के प्रेम ने ,तुममे  वो रंग भर दिया की ,तुम्हारी खूबसूरती का बखान तो लॉर्ड विलियम बेंटिक (1828–1833) के वास्तुकार ,ग्राहम पिकफोर्ड ने भी  अपनी पुस्तक "हिस्टोरिक स्ट्रक्चर्स ऑफ़ अवध"  में किया ! तूने सबको अपनाया , सबको अपना माना , सबके प्रेम को खुले दिल से स्वीकार्य भी किया ! तुम्हारे भीतर कई सम्प्रदायों का मिलन होता था ! तुम्हारे भीतर कोई इबादत करता था तो कोई सच्ची आराधना में मशगूल था ! शायद तुम्हारे इसी प्यार ने गंगा जमुनी तहज़ीब की एक मिसाल  कायम की !
                             एक ऐसी मिसाल जिसे आज तक भुलाया न जा सका , तुझे मिटाने की कोशिशे तो बहुत हुई पर तुझे आज भी हमारे दिल से मिटाया न जा सका ! तुझ पर ज़ुल्म ढाये गये , तेरे अस्तित्व पर सवाल खड़े किये गए ! तुझ पर नेताओं ने अपनी राजनीतिक  रोटियां  सेंकी ! तेरे प्यार और लोगो की आस्थाओं का मज़ाक बनाया गया ! तेरा और उनका (जिन्होंने तुझे लूटा)  सबका केवल इस्तेमाल किया गया ! जब तुझे क़त्ल करने की कोशिशें की जा रही थी तब भी तू किसी माँ की तरह खड़ी सब सह रही थी ! हम तो तुम्हारी याद में काला दिवस (BLACK DAY ) मना लेते हैं, पर कभी कभी सोचता हूँ कि तुम उस दिन को कैसे काटती होगी ! कैसे उन सब  ज़हरीली यादो के साथ  जीती होगी ! कैसे आज भी तुम अपने अस्तित्व के लिए लड़ती होगी ! तुम्हे कितनी तकलीफ होती होगी जब तुम उन  खूनियो को अपने नापाक मंसूबो में कामयाब होते देखती होगी ! उन खूनियो ने आज तुम्हारी लाश पर अपनी कामयाबी की इमारत खड़ी कर ली है !
            और तुम्हे बदले में क्या मिला , न तुम राम की हो पायी न रहीम की ! बस आज तुम्हारा नाम एक विवादास्पद स्थल के रूप में लिया जाता है ! एक ऐसा स्थल जिसके कारण हज़ारों लोगो को अपनी जान गंवानी पड़ी ! ऐसा स्थल जो आज भी तमाशबीनों के लिये मनोरंजन का एक केंद्र है ! जानता हूँ कि अपनी इन अनैतिक परिभाषाओं को सुनकर तुम्हारा दिल ज़रूर रो देता होगा !  लेकिन तुम फ़िक्र मत करो आज भी तुम्हे हर कोई हासिल कर लेना चाहता है पर उसे तुम्हारे स्वास्थ (हालात) कि नहीं बल्कि अपने स्वार्थ की चिंता है ! 
                                                                                                             - सलमान अली