क्या वाक़ई कोई भाषा सांप्रदायिक हो सकती है ? आसान शब्दों में भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारो को व्यक्त करते हैं ! अब ये लिखने वाले पर निर्भर करता है कि उसके विचार लोकतांत्रिक है या सांप्रदायिक ! अगर आपके विचार सांप्रदायिक हैं तो आप उसे दुनिया कि किसी भी भाषा में चस्पा करें वो हर हालत में सांप्रदायिक ही रहेंगे ! सांप्रदयिकता तो वहाँ भी है जहां हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार नहीं है ! वहाँ भी तो दंगे होते होंगे और भड़काऊ भाषण भी दिए ही जाते होंगे बस उनको लिखने का माध्यम अलग होगा ! फिर क्या वजह हो सकती है कि आप किसी भाषा को सांप्रदायिक कह देते हैं ?
इस बेमतलब और घिसे पिटे सवाल से इसिलए जूझ रहा हूं क्योंकि मेरे किसी काबिल साथी ने कहा कि हिंदी एक सांप्रदायिक भाषा है क्यूंकि इसका इस्तेमाल अधिकतर वो वर्ग करता रहा है जो सांप्रादायिक सोच से प्रेरित हैं ! वो ये सब बोलते हुए कहते हैं कि ये उनकी अपनी राय है जो उन्होंने हिंदी के इतिहास व इस्तेमाल को देखकर बनाई है ! ताज्जुब तब हुआ जब सुना कि उनके लिए भाषा कि पहचान कागज़ के वो बिकाऊ टुकड़े हैं जिन्हे हम अखबार कहते हैं !
एक भाषा का उदाहरण ले लीजिये जिसका इस्तेमाल दहशतगर्द आतंकवाद के प्रचार प्रसार के लिए करते हैं तो क्या आप उस भाषा को भी आतंकवादी भाषा कहने लगेंगे ! आप कहेंगे कि ये क्या बात होती है आतंकवाद का तो कोई धर्म और कोई भाषा नहीं होती ! फिर मै कहूँगा कि जब एक भाषा उसके इस्तेमाल करने वालो के आधार पर आतंकवादी भाषा नहीं हो सकती तो फिर कोई भाषा सांप्रदायिक कैसे हो सकती है !
जनाब इन राष्ट्रवादियों कि बहसों से हम पहले ही बहुत पक चुके हैं ! अब भाषा को भी मत बांटिये की ये भाषा देशभक्त हैं और ये देशद्रोही हैं ! बाकी रही हिंदी भाषा तो जनाब यही वो भाषा हैं जिसने आज़ादी के समय पूरे देश को एक सूत्र में बांधे रखा था ! यही वो भाषा हैं जिसका इस्तेमाल कर रामधारी सिंह "दिनकर" जैसे लेखको ने ऐसी कवितायेँ और लेख लिखे जिसने इस देश के युवा में आज़ादी के प्रति जागरूकता पैदा की और आज़ादी के दीवानो को जोश से भर दिया ! 1 अरब 80 करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को चंद अखबारों और लेखों के आधार पर सांप्रदायिक बोल देना नाइंसाफी हैं !
मेरे नज़रिये में दुनिया की हर भाषा फूल की तरह कोमल हैं अब आप पर निर्भर हैं आप चाहे तो उसके शब्दों को गूंथकर माला बना लीजिये या उसे अपने ही हाथो से रौंद डालिये !
- सिराज अहमद
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